Level-3_Lecture-9

श्लोका: सुभाषितं च | SHLOKAS & SUBHASHITAM

नियतं कुरु कर्म त्वं, कर्म ज्यायो ह्यकर्मण: | शरीरयात्रापि च ते, न प्रसिद्धयेदकर्मण: ||

(हे मनुष्य) नित्य कर्म करता जा, शरीर यात्रा (निर्वाह) अकर्म से सिद्ध नहीं होगा |


यो न ह्रष्यति न द्वेष्टि, न शोचति न काङ्ग्क्षति | शुभाशुभ परित्यागी भक्तिमान् य: स मे प्रिय: || 

जो हर्ष तथा शोक नहीं करता और न ही कोई आकांक्षा रखता है, शुभ अशुभ को जिसने त्याग दिया है वह भक्तिमान मनुष्य मुझे प्रिय है | 


य: शास्त्रविधिमृत्सृज्य, वर्तते कामकारत: | न स सिध्धिमवाप्नोति, न सुखं न परां गतिम् || 

शास्त्रों की अवहेलना कर के अपनी मनमानी करने वाला न तो कोई सिद्धि प्राप्त करता है, न ही कोई सुख अथवा परम गति प्राप्त करता है |


दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे। देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्।।17.20।।

।।17.20।।दान देना कर्तव्य है — ऐसे भावसे जो दान देश, काल और पात्रके प्राप्त होनेपर अनुपकारीको दिया जाता है, वह दान सात्त्विक कहा गया है।


यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः। दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम्।।17.21।।

।।17.21।।किन्तु जो दान प्रत्युपकारके लिये अथवा फलप्राप्तिका उद्देश्य बनाकर फिर क्लेशपूर्वक दिया जाता है, वह दान राजस कहा जाता है।


त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः। यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे।।18.3।।

।।18.3।।श्रीभगवान् बोले — कई विद्वान् काम्य-कर्मोंके त्यागको संन्यास कहते हैं और कई विद्वान् सम्पूर्ण कर्मोंके फलके त्यागको त्याग कहते हैं। कई विद्वान् कहते हैं कि कर्मोंको दोषकी तरह छोड़ देना चाहिये और कई विद्वान् कहते हैं कि यज्ञ, दान और तप-रूप कर्मोंका त्याग नहीं करना चाहिये।


यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्। यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम्।।18.5।।

।।18.5।।यज्ञ, दान और तपरूप कर्मोंका त्याग नहीं करना चाहिये, प्रत्युत उनको तो करना ही चाहिये क्योंकि यज्ञ, दान और तप — ये तीनों ही कर्म मनीषियोंको पवित्र करनेवाले हैं।


न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः। यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते।।18.11।।

।।18.11।।कारण कि देहधारी मनुष्यके द्वारा सम्पूर्ण कर्मोंका त्याग करना सम्भव नहीं है। इसलिये जो कर्मफलका त्यागी है, वही त्यागी है — ऐसा कहा जाता है।


स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु।।18.45।।

।।18.45।।अपने-अपने कर्ममें तत्परतापूर्वक लगा हुआ मनुष्य सम्यक् सिद्धि-(परमात्मा-)को प्राप्त कर लेता है। अपने कर्ममें लगा हुआ मनुष्य जिस प्रकार सिद्धिको प्राप्त होता है? उस प्रकारको तू मेरेसे सुन।


सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।।18.66।।

।।18.66।।सम्पूर्ण धर्मोंका आश्रय छोड़कर तू केवल मेरी शरणमें आ जा। मैं तुझे सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त कर दूँगा, चिन्ता मत कर।


श्रेयो हि ज्ञानमभ्यसाज्ज्ञानाद्ध्यानं विशिष्यते | शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान् य: स मे प्रिय: || 

अभ्यास से श्रेष्ठ (बढ़कर) ज्ञान है, उससे बढ़कर ध्यान है | ध्यान से बढ़कर कर्मफल त्याग है जिससे मनको शांति मिलती है |


विहाय कामान् य: सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः। निर्ममो निरहंकारः स शांतिमधिगच्छति।।

जो मनुष्य सम्पूर्ण कामनाओंका त्याग करके स्पृहारहित, ममतारहित और अहंकाररहित होकर आचरण करता है, वह शान्तिको प्राप्त होता है।


जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च। तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि।।

क्योंकि पैदा हुएकी जरूर मृत्यु होगी और मरे हुएका जरूर जन्म होगा। इस (जन्म-मरण-रूप परिवर्तन के प्रवाह) का परिहार अर्थात् निवारण नहीं हो सकता। अतः इस विषयमें तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये।


क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते। क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप।।

हे पृथानन्दन अर्जुन ! इस नपुंसकताको मत प्राप्त हो; क्योंकि तुम्हारेमें यह उचित नहीं है। हे परंतप ! हृदयकी इस तुच्छ दुर्बलताका त्याग करके युद्धके लिये खड़े हो जाओ।


उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्। आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ||

अपने द्वारा अपना उद्धार करे, अपना पतन न करे; क्योंकि आप ही अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु है।


असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलं। अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते।।

हे महाबाहो ! यह मन बड़ा चञ्चल है और इसका निग्रह करना भी बड़ा कठिन है — यह तुम्हारा कहना बिलकुल ठीक है। परन्तु हे कुन्तीनन्दन ! अभ्यास और वैराग्यके द्वारा इसका निग्रह किया जाता है।


मुक्ताफलै: किं मृगपक्षिणां मिष्टान्नपानं किमु गर्दभानाम् | अन्धस्य दीपो बधिरस्य गितं मूर्खस्य किं शास्त्र्कथप्रसङ्ग:||

हिरणों और पक्षियों के खाने-पीने के लिए मोती के फलों का क्या उपयोग है? गधे को मिष्टान्न से क्या लाभ? अंधे को दिया, और बहरे को गीत क्या काम के ? (वैसे हि) मूर्ख को धर्मकथा गान से क्या लाभ ?


यौवनं धनसंपत्ति: प्रभुत्तमविवेकता| एकैकमप्यनर्थाय किमु यत्र चतुष्टयम् ||

(एकैकमप्यनर्थाय = एकैकम् + अपि + अनर्थाय)

यौवन, धन, प्रभुता और अविवेक यह चार जहा कहीं किसी के पास है, असीमित अनर्थ करने के लिए पर्याप्त है |

Youth, wealth, lordship and indiscretion, wherever one has these four, it is sufficient to do unlimited damage.

યૌવન, ધન, આધિપત્ય અને અવિવેક, આ ચાર જ્યાં પણ હોય ત્યાં તે અમર્યાદિત દુષ્કર્મ માટે પૂરતું છે.


भोगा न मुक्ता वयमेव भुक्ता स्तपो न तप्तं वयमेव तप्ताः । कालो न यातो वयमेव याता सतृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णाः ।।१२।। वै.श.

हम विषयों को न भोग सके, विषयों ने ही हमें भोग लिया। हम तप नहीं कर सके, पर तप ने ही हमें तपा लिया ; काल व्यतीत न हुआ, किन्तु हम ही व्यतीत हो गए ; तृष्णा समाप्त न हुई, किन्तु हम ही समाप्त हो गये ।

We could not enjoy the subjects, the subjects enjoyed us. We could not do penance, but penance did us. Time has not passed, but we have passed; The craving didn’t end, but we ended.

ભાવાર્થ: તુષ્ણા જીર્ણ ના થઇ, અમે જીર્ણ થઇ ગયા.


स्थानभ्रष्टा न शोभन्ते दन्ताः केशा नखा नराः। इति विज्ञाय मतिमान् स्वस्थानं न परित्यजेत्॥

दांत, बाल, नाखून और पुरुष अपना स्थान खो देने के बाद शोभा नहीं पाते हैं, बुद्धिमान पुरुषों को अपने स्थान पर स्थिर रहना चाहिए।

It looks odd if teeth, hair, nails, and men are not at their proper place. knowing this, wise man never leaves his place (occupation). Every body should stick to his / her own duty. Doing something else is not desirable.

ભાવાર્થ: ડાહ્યા માણસોએ પોતાના સ્થાન પર સ્થિર રહેવું જોઈએ.


सुखस्य दुःखस्य न कोऽपि दाता परो ददाति इति कुबुध्दिरेषा । अहं करोमीति वृथाभिमानः स्वकर्मसूत्रग्रथितो हि लोकः ॥

सुख और दुःख देनेवाला कोई नहीं है । दूसरा आदमी हम को वह देता है यह विचार भी गलत है । “मैं करता हूँ” एसा अभिमान व्यर्थ है । सभी लोग अपने अपने पूर्व कर्मों के सूत्र से बंधे हुए हैं । (निषादराज गृहक कैकेयी और मंथराको दोष देता है तब लक्षमण की उक्ति)

ભાવાર્થ: મનુષ્ય પોતાના કર્મો થી જ બંધાયેલ છે.


रोगी चिरप्रवासी परान्नभोजी परावसथशायी। यज्जीवति तन्मरणं यन्मरणं सोऽस्य विश्रामः ।।७३।। नीतिशास्त्र

रोगी, सदा परदेश रहनेवाला, परान्नभोजी और दूसरे के घर सोनेवाले पुरुष का जीवन ही मृत्युतुल्य है और जो वास्तविक मरता हैं वहीं उसका विश्राम है।

The life of a person who is patient, always living abroad, a voracious eater and sleeping in other’s house is equivalent to death and the one who really dies, rests there.

ભાવાર્થ: આવા લોકો ને વિશ્રામ નથી. મૃત્યુ જ વિશ્રામ આપે.


सुलभा: पुरुषा: राजन्‌ सततं प्रियवादिन: । अप्रियस्य तु पथ्यस्य वक्ता श्रोता च दुर्लभ:।।

हे राजन, प्रिय बोलने वेल पुरुष तो सुलभता से मिल जाते हैं, परंतु अप्रिय एवम् हितकर बात कहने वाले लोग बड़े दुर्लभ होते हैं !

English : Oh dear King! you may easily find people who speak good for you and praise you, but people who speak of ills and who speak for your welfare, are rarely found in this world.

ભાવાર્થ: અપ્રિય અને ફાયદાકારક વાતો કહેનારા લોકો બહુ ઓછા છે!


सर्वे यत्र विनेतारः सर्वे पंडितमानीनः। सर्वे यत्र महत्त्वं वांछन्ति स वृन्दमवसीदति।।

सभी जंहा नेता हो जायें, सब अपने को पंडित मानने लगें। जहां सब के सब महत्त्व की इच्छा करने लगें उस समूह का पतन सुनिश्चित है।

Wherever everyone becomes a leader, everyone starts considering himself as a pundit. Where everyone starts desiring importance, the downfall of that group is sure.

ભાવાર્થ: જ્યાં બધા પોતાને નેતા માને છે એ રાષ્ટ્ર નાશ પામે છે.


अहो दुर्जनसंसर्गान्मानहानिः पदे पदे। पावको लोहसङ्गेन मुद्गरैरभिहन्यते॥

जैसे लोहे की निकटता से पवित्र अग्नि को भी हथौड़ों से घाव खाने पडते हैं, उसी तरह दुर्जन के संसर्ग से अच्छे इन्सान की भी कदम कदम पर मानहानि होती हैं।

Whenever the holy fire is in company with iron, it is beaten by mallets, in the same way a good person is humiliated at every step while living with the unworthy person.

ભાવાર્થ: દુર્જન ની સંગતિ છોડી દેવી.


जीवन्तोSपि  मृताः पञ्च  व्यासेन परिकीर्तिताः | दरिद्रो  व्याधितो  मूर्खः प्रवासी  नित्यसेवकः  ||

दरिद्र,  बीमार, मूर्ख, अपने परिवार से दूर विदेश मे रहने  वाले तथा बंधुआ मजदूर  , ये पांच प्रकार  के व्यक्ति  दीर्घजीवी होने पर भी एक मृतक के  समान होते हैं|

Poor, sick, foolish, living abroad away from their families and bonded labourers, these five types of persons are like a dead person even though they live long.


मातृवत् परदारेषु परद्रव्याणि लोष्ठवत्। आत्मवत् सर्वभूतानि यः पश्यति सः पण्डितः॥

दूसरे की पत्नी को अपनी माँ की तरह, दूसरे के धन को मिट्टी के समान, सभी को अपने जैसा जो देखता है वो ही पंडित (ज्ञानी) है।

He is a wise man who sees the wives of others as his mother, the wealth of others like clod of earth and all beings as his own self.

ભાવાર્થ: વિવેક સદા બનાવેલો રાખવો.


दधि मधुरं मधु मधुरं द्राक्षा मधुरा सितापि मधुरैव। तस्य तदेव हि मधुरं यस्य मनो यत्र संलग्नम्॥

Curd is pleasant, honey is pleasant, grapes are pleasant and sugar (or nectar), too, is pleasant. But (though all these things are pleasant) the only thing pleasant to one is that to which his mind is attached.

दही मधुर होता है, शहद मधुर होता हैं, अंगुर भी मधुर होता हैं और चीनी भी (या अमृत भी) मधुर होता हैं, परन्तु (ये सभी चीजें मधुर होने के बावजूद) किसी भी व्यक्ति के लिये वही मधुर (प्रिय) हैं जहाँ उसका मन लगा हुआ हैं।

ભાવાર્થ: જ્યાં મન ગયું તે મીઠું


अर्थनाशं मनस्तापं गृहे दुश्चरितानि च । वञ्चनं चापमानं च मतिमान्न प्रकाशयेत् ॥१॥

धन की हानि, मानसिक पीड़ा और घर में दुराचार। एक बुद्धिमान व्यक्ति को छल या अपमान प्रकट नहीं करना चाहिए।

Loss of wealth, mental anguish, and misconduct at home. A wise man should not reveal deception or insult.

ભાવાર્થ: અમુક બાબતો ગુપ્ત રાખવી.


काव्य शास्त्र विनोदेन, कालो गच्छति धीमताम्। व्यसनेन च मूर्खाणां, निद्रयाकलहेन वा ।|

काव्य शास्त्र आनंद से, समय ज्ञानी कटै।। मूर्खों की लत, या नींद या झगड़ा। .

Poetry and scripture with joy, time passes by the wise. Addiction to fools, or sleep or quarreling.

ભાવાર્થ: સમય ન વેડફવો


प्रियवाक्य प्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः । तस्मात तदैव वक्तव्यम वचने का दरिद्रता।।

प्रिय वाक्य बोलने से सभी जीव संतुष्ट हो जाते हैं, अतः प्रिय वचन ही बोलने चाहिएं।

Only dear words should be spoken. … Means:- All living beings are satisfied by speaking dear words, so only dear words should be spoken.

ભાવાર્થ: આપણી વાણી સદા પ્રિય રાખો.